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रौशनी के त्योहार में अंधेरा — जब कोल्ड्रिफ कफ सिरप ने छीन ली 24 मासूमों की जिंदगी

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छिंदवाड़ा/बैतूल।
जब पूरा देश दीपों से जगमगा रहा है, मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा और आसपास के 24 घर अंधेरे में डूबे हुए हैं। वहां न दीये जले, न हंसी गूंजी… क्योंकि इन घरों के नौनिहाल अब इस दुनिया में नहीं हैं। दिवाली से कुछ दिन पहले जिस दवा से राहत मिलनी थी, उसी जहरीले कोल्ड्रिफ कफ सिरप ने उनके प्राण ले लिए।

मासूम ऋषिका, आतिया, सत्या, योजिता, विकास और शिवम जैसे बच्चे अब सिर्फ यादों में हैं।
कफ सिरप बनाने वाली कंपनी का लालच, डॉक्टरों की कमीशनखोरी और सरकारी तंत्र की लापरवाही ने मिलकर 24 मासूमों को मौत की नींद सुला दिया। इन परिवारों के घरों में आज भी सन्नाटा पसरा है। जहां कभी बच्चों की खिलखिलाहट गूंजती थी, वहां अब मातम का माहौल है।

जहर बना इलाज, सरकार की नींद अब भी पूरी नहीं

7 सितंबर से अब तक छिंदवाड़ा और बैतूल में 24 से ज्यादा बच्चों की मौत हो चुकी है।
सर्दी-जुकाम में दी जाने वाली दवा कोल्ड्रिफ में पाया गया 48.6% डाईएथिलीन ग्लाइकॉल, जो किडनी फेल करने वाला जहरीला रसायन है।
तमिलनाडु के कांजीपुरम में बनी यह दवा छोटे-छोटे बच्चों के लिए मौत का पेय बन गई।

जब हाहाकार मचा तो सरकार ने कोल्ड्रिफ पर बैन जरूर लगाया, लेकिन जवाबदेही अब भी गायब है।
किसने दवा की जांच की? किसने इसे बाजार में उतारने की अनुमति दी? कौन जिम्मेदार है इन 24 मासूमों की मौत का?
अब तक किसी अधिकारी पर कार्रवाई नहीं हुई। और यही सबसे बड़ा अपराध है।

मां-बाप का दर्द: “हमने खुद अपने हाथों से जहर पिलाया…”

छिंदवाड़ा के हर गली-मोहल्ले में आज भी मातम पसरा है।
एक पिता की आंखों में अब भी वो लम्हा तैरता है, जब डॉक्टर ने कहा था – “2 एमएल कोल्ड्रिफ, दिन में चार बार।”
कौन जानता था कि वही सलाह उनके बच्चे की जान ले लेगी।
कई परिवारों ने अपने बच्चों को बचाने के लिए जमीन और गहने तक बेच डाले, पर मौत को कोई नहीं रोक सका। अब उनके पास बस तस्वीरें और इंसाफ की उम्मीद बची है।

सिस्टम पर सवाल

क्या अब भी कोई सोएगा?
क्या किसी अधिकारी को सस्पेंड किया गया?
क्या किसी डॉक्टर की लाइसेंस रद्द हुई?
क्या कोई मंत्री इन घरों तक पहुंचा?
जवाब है — नहीं।

जब तक ऐसे केसों में सिस्टम पर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक हर माता-पिता डर के साए में रहेंगे।

*जहरीला सिरप बेचने वाली कंपनी के खिलाफ हत्या का मुकदमा चले।*

*दोषी अधिकारियों पर तुरंत कार्रवाई हो।*

*और भविष्य में बच्चों की दवाओं की हर खेप की लैब टेस्टिंग अनिवार्य हो।*

*ये दिवाली छिंदवाड़ा के उन 24 परिवारों के नाम, जिनके घर के दीये बुझ चुके हैं।*

*सवाल सिर्फ इतना है — कब तक हमारी सिस्टम की लापरवाही मासूमों की जान लेती रहेगी?*

स्रोत:- (NTB) अखिलेश श्रीवास्तव

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Pankaj Pandey

संपादक - आक्रामक न्यूज़

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