

लालकुआं की जनता अब इंतजार में है — क्या 2027 के चुनाव से पहले कोई पार्टी इस शहर की सांसें बहाल करेगी? या फिर वादों और घोषणाओं की फाइलों में ही लालकुआं का भविष्य दम तोड़ देगा?
लालकुआं।
कभी शांत माना जाने वाला लालकुआं शहर अब अव्यवस्था और जाम की गिरफ्त में बुरी तरह जकड़ चुका है। शहर का दम इस कदर घुटने लगा है कि अब रैलियां हों, धार्मिक अनुष्ठान (झांकी) या विरोध प्रदर्शन — हर आयोजन लोगों के लिए परेशानी का सबब बनता जा रहा है।
107 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल और लगभग एक लाख की आबादी वाली लालकुआं तहसील अब अपनी सीमित सड़कों और ठहरी हुई व्यवस्थाओं से कराह रही है। 2011 की जनगणना के अनुसार यहां की जनसंख्या 94,724 थी, जिसमें पुरुषों की संख्या 49,676 और महिलाओं की 45,048 थी। नगर क्षेत्र में मात्र 7,644 लोग बसे थे, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं — आबादी और ट्रैफिक दोनों बेकाबू हैं, जबकि सुविधाओं का ग्राफ वहीं का वहीं रुका है।
शहर के बीचोंबीच से गुजरने वाला स्टेट हाईवे अब बोझ नहीं झेल पा रहा। सड़क के दोनों ओर दुकानों और मकानों के कारण चौड़ीकरण नामुमकिन बना हुआ है। दुकानों का फुटपाथों पर फैलाव और ठेले-फड़ियों की अव्यवस्था ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। नतीजा — दिनभर गाड़ियों की कतारें, हॉर्न का शोर और लोगों की बेबसी।
पर्यटन के शौकीन पहाड़ों को जाने वाले बाहरी राज्यों — उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और बिहार — से आने वाले पर्यटकों की गाड़ियां भी इसी मार्ग से गुजरती हैं, जिससे शहर का यातायात रोज चरमराता है।
कुमाऊं का सबसे बड़ा रेलवे स्टेशन लालकुआं, जहां से देश के महानगरों के लिए दर्जनों ट्रेनें चलती हैं, अब खुद अव्यवस्था का प्रतीक बन चुका है। स्टेशन के पास स्थित रेलवे फाटक अक्सर बंद रहता है, जिससे लालकुआं से बिंदुखत्ता आने-जाने वाले हजारों लोग घंटों फंसे रहते हैं।
सूत्रों द्वारा शहर में फ्लाईओवर की योजना अब तक कागजों में ही सीमित है। धरातल पर कोई काम शुरू नहीं हुआ, जिससे बिंदुखत्ता की करीब एक लाख की आबादी का धैर्य जवाब देने लगा है। जनता पूछ रही है — “विकास की बातें कब हकीकत बनेंगी?”
उधर, शहर में बस अड्डा न होने से भी आम लोगों की मुश्किलें बढ़ी हैं। सरकारी वाहन बिना निश्चित स्टॉप के चलते हैं और यात्रियों को काफी पैदल चलना पड़ता है।
लालकुआं नगर पंचायत द्वारा सुधार की कवायद जरूर शुरू की गई, लेकिन विरोध और राजनीतिक खींचतान के बीच योजनाएं अधर में लटकी हैं।
लालकुआं की जनता अब इंतजार में है — क्या 2027 के चुनाव से पहले कोई पार्टी इस शहर की सांसें बहाल करेगी? या फिर वादों और घोषणाओं की फाइलों में ही लालकुआं का भविष्य दम तोड़ देगा?






