एन.डी. तिवारी: आज ही जन्मे, आज ही कहा अलविदा— लेकिन जो छोड़ा, वो कोई मिटा नहीं सका!

उत्तराखंड की नींव रखने वाले, विकास के सबसे बड़े शिल्पकार, और राजनीति के असली चाणक्य — स्व. नारायण दत्त तिवारी का नाम आज भी जनता के दिलों में दर्ज है।
आज उनकी जयंती और पुण्यतिथि दोनों है।
एक ऐसा नेता, जो उसी दिन जन्मा और उसी दिन इस दुनिया से चला गया — शायद प्रकृति भी उनके जैसा दूसरा चेहरा नहीं बना पाई।
एन.डी. तिवारी सिर्फ नेता नहीं, सोच थे।
वो सोच कि विकास योजनाओं में सिर्फ फाइलें नहीं, जनता की सांसें चलनी चाहिए।
उत्तराखंड को राज्य बनाने से लेकर उसे पहचान देने तक, तिवारी ने वो सब किया जो आज तक कोई दोहरा नहीं सका।
मुख्यमंत्री रहते उन्होंने काम से विरोधियों को भी झुकाया, और केंद्र में मंत्री रहते हुए देश के विकास मॉडल में उत्तराखंड की मिसाल पेश की।
आज भी कई योजनाएं, कई नीतियां, और कई संस्थान उनकी दूरदर्शिता की पहचान हैं।
हाँ, तिवारी विवादों में भी रहे।
उनके रसिक अंदाज़ पर चर्चा भी हुई, आलोचना भी।
लेकिन जिस दौर में रिश्वतखोरों की भीड़ थी, वो रिश्वत नहीं, प्यार लेते थे।
उनकी ज़िंदगी सीधी थी — जो दिल में था, वही जुबां पर था।
पर दुखद यह है कि जिनके लिए उन्होंने अपनी राजनीति, अपना जीवन और अपना वजूद खपा दिया,
वही आज उनका नाम लेने से कतराते हैं।
कांग्रेस में भी तिवारी का नाम अब पोस्टरों से गायब है —
वहीं कुछ ऐसे नेता भी हैं जो उनके नाम का दीपक जलाए हुए हैं
कम से कम उन्होंने वो किया जो बाकी नहीं कर पाए —
अपने राजनीतिक गुरू के प्रति कृतज्ञता दिखाना।
सवाल यह है —
क्या कांग्रेस आज भी एन.डी. तिवारी के योगदान को भुलाने की साज़िश में है?
या अब वो पार्टी, जिसने राज्य बनाने वाले को भुला दिया, खुद भी भुला दी जाएगी?
तथ्य ये है कि एन.डी. तिवारी जैसा नेता सिर्फ पैदा नहीं होता,
वो युग गढ़ता है।
और उनका युग अभी खत्म नहीं हुआ —
वो हर सड़क, हर योजना, हर जनता की उम्मीद में जिंदा है।
स्व. एन.डी. तिवारी जी को शत्-शत् नमन
आपका योगदान, आपकी राजनीति और आपकी पहचान — उत्तराखंड की मिट्टी में हमेशा दर्ज रहेगी।








